Organic Farming

मसूर की खेती

रबी की दलहनी फसलों में मसूर का प्रमुख स्थान है। यह यहाँ की एक बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय दलहनी फसल है जिसकी खेती प्रायः हर राज्य में की जाती है। कृषि वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि धान के कटोरे में दलहन की खेती की भी अपार संभावनाएं हैं।इसकी खेती प्रायः असिंचित क्षेत्रों में धान के फसल के बाद की जाती है । रबी मौसम में सरसों एवं गन्ने के साथ अंततः फसल के रूप में लगाया जाता है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने में भी मसूर की खेती बहुत सहायक होती है। उन्नतशील उत्पादन तकनीको का प्रयोग करके मसूर की उपज में बढ़ोतरी की जा सकती है।

जलवायु 

सतावर की खेती

सतावर जड़ वाली एक औषधीय फसल है जिसकी मांसल जड़ों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्माण में होता है। सतावर को लोग भिन्न-भिन्न नाम से पुकारते हैं। अंग्रेज लोग इसे एस्पेरेगस कहते हैं। कहीं इसे लोग शतमली तो कहीं शतवीर्या कहते हैं। सतावर कहीं वहुसुत्ता के नाम से विख्यात है तो कहीं यह शतावरी के नाम से भी। यह औषधीय फसल भारत के विभिन्न प्रांतों में प्राकृतिक अवस्था में भी खूब पाई जाती है। विश्व में सतावर भारत के अतिरिक्त ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, चीन, बांग्लादेश तथा अफ्रीका में भी पाया जाता है। सतावर का प्रयोग मुख्य रूप से औषधि के रूप में किया जाता है। इसका इस्तेमाल बलवर्धक, स्तनपान करने वाली

नीम एक सर्वोत्तम कीटनाशक

प्रक्रति की एक अमूल्य देंन  है नीम नीम लोगों की दैनिक जिन्दगी में एक महत्वपूर्ण भूमिका रखता है नीम एक औषधि है और एक प्रभावशाली कीटनाशक भी आधुनिक जहरीले कीटनाशकों की तुलना में नीम एक सर्वोत्तम कीटनाशक है। अनाज के भंडारण, दीमकों से सुरक्षा से लेकर पेड़-पौधों की हर तरह की बीमारी में इसके विविध उपयोग आज भी लोग किया करते हैं। इस क्षेत्र में किसानों को यदि वैज्ञानिकों का सहयोग मिल जाए तो यह अकेला वृक्ष दुनिया भर के कीटनाशकों के कारखाने बंद करवा सकता है।

फसलों पर खाद एवं उर्वरकों का प्रभाव

जिस प्रकार मनुष्य तथा पशुओं के लिए भोजन की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार फसलों से उपज लेने के लिए पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों की आपूर्ति करना आवश्यक है| फसलों के लिए आवश्यक पोषक तत्व जमीन में खनिज लवण के रूप में उपस्थित रहते हैं, लेकिन फसलों द्वारा निरंतर पोषक तत्वों का उपयोग, भूमि के कटाव तथा रिसाव के द्वारा भूमि से एक या अधिक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, जिसे किसान भाई खाद और उर्वरक के रूप में खेतों में डालकर फसलों को उनकी आपूर्ति करते हैं ।

मिट्टी में नमी कायम रखने के आधुनिक तरीके

मिट्टी में जरूरत के मुताबिक नमी का होना बहुत जरूरी है । खेत की तैयारी से लेकर फसल की कटाई तक मिट्टी में एक निश्चित नमी रहनी चाहिए । कितनी नमी हो यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा कार्य करना है और मिट्टी की बनावट कैसी है । जैसे बलुवाही मिट्टी में कम नमी रहने से भी जुताई की जा सकती है, लेकिन चिकनी मिट्टी में एक निश्चित नमी होने से ही जुताई हो सकती है । इसी तरह अलग-अलग  फसलों के लिए अलग-अलग  नमी रहनी चाहिए । जैसे -धान के लिए अधिक नमी की जरूरत है लेकिन बाजरा, कौनी वगैरह कम नमी में भी उपजाई जा सकती है|

राइजोबियम जीवाणु कल्चर एवं उपयोगिता

राइजोबियम कल्चर 'राइजोबियम' नामक जीवाणुओं का एक संग्रह है जिसमें हवा से नेत्रजन प्राप्त करने वाले जीवाणु काफी संखया में मौजूद रहते है,  जैसा कि आप जानतें है कि सभी दलहनी फसलों की जड़ों में छोटी-छोटी  गांठें पायी जाती है । जिसमें राइजोबियम नामक जीवाणु पाये जाते हैं । ये जीवाणु हवा से नेत्रजन लेकर पौधों को खाद्य के रूप में प्रदान करते हैं । इस कल्चर का प्रयोग सभी प्रकार के दलहनी फसलों में किया जाता है ।

अमृत घोल

 

विशेषतायें
i. मिट्टी में मुख्य पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) के जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि करता है।
ii. शीघ्र तैयार होने वाली खाद है।
iii. मिट्टी को पोली करके जल रिसाव में वृद्धि करता है।
iv. मिट्टी को भुरभुरा बनाता है तथा भूमि की उत्पादकता में वृद्धि करता है।
v. फसलों पर कीट व रोगों का प्रकोप कम करता है।
vi. स्थानीय संसाधनों से बनाया जा सकता है।
vii. इसको बनाने की विधि सरल व सस्ती है।

आवश्यक सामग्री

 

गौमूत्र                               1 ली. (देशी गाय)

जीवाणु खाद मिट्टी के लिये वरदान

पौधों की उचित वृद्धि एवं ज्यादा उपज के लिये नाइट्रोजन, स्फूर, पोटाश तथा अन्य पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है । यह पोषक तत्व रासायनिक खाद द्वारा पौधों को उपलब्ध कराये जाते हैं । मिट्टी में कुछ ऐसे भी सूक्ष्मजीवी जीवाणु है जो पौधों को मिट्टी में डाले गये पोषक तत्वों को उपलब्ध कराने में मदद करते हैं । जब ऐसे जीवाणुओं की संख्या  प्रयोगशाला में बढ़ा कर ठोस माध्यम में मिश्रित कर पैकेट के रूप में किसानों को उपलब्ध कराये जायें तो उसे ''जीवाणु खाद'' कहते हैं ।

मटका खाद

विशेषतायें
i. स्थानीय संसाधनों से तैयार किया जाता है।
ii. यह तकनीक सरल, सस्ती और प्रभावशाली है।
iii. पौधों में वानस्पतिक वृद्धि तेजी से करती है।
iv. भूमि में मित्र जीवाणुओं की संख्या बढ़ाता है।
v. भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करता है और उत्पादन बढ़ाता है। 
vi. इसके उपयोग से रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होगी।
vii. फसल की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

आवश्यक सामग्री

 

गौमूत्र                                     15 ली. (देशी गाय)

गाय का ताजा गोबर                     15 कि.ग्रा.

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